गौ-पालन हमारा अधिकार, तो अत्याचार करने वालों पर क्यों नहीं होता कड़ा प्रहार?
आज हमारे समाज में एक बहुत ही अजीब और दुखद विरोधाभास देखने को मिल रहा है। सुबह उठकर सबको चाय के लिए शुद्ध दूध चाहिए, बच्चों की सेहत के लिए असली घी चाहिए, और त्योहारों पर खोए की मिठाइयां चाहिए। लेकिन जब बात उस दूध को देने वाली गौ माता की सेवा, सुरक्षा और पालन की आती है, तो कुछ लोगों की त्योरियां चढ़ जाती हैं।
यदि कोई व्यक्ति अपने घर में श्रद्धा या व्यवसाय के लिए गाय पालता है, तो आस-पास के कुछ लोग लाठी-डंडे लेकर लड़ने चले आते हैं। उन्हें अचानक गाय से परेशानी होने लगती है। आज हमें इस दोहरी मानसिकता पर खुलकर और गहराई से बात करने की जरूरत है।
गौ-पालन हमारा विधिक और सांस्कृतिक अधिकार है
भारत की संस्कृति, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हमेशा से गाय रही है। देश का संविधान और कानून हर नागरिक को अपने पालतू पशुओं को सम्मान और सुरक्षा के साथ पालने का पूरा अधिकार देता. यदि कोई व्यक्ति जिम्मेदारी के साथ अपने निजी परिसर में गाय रख रहा है, सफाई का ध्यान रख रहा है, तो किसी भी बाहरी व्यक्ति को उसमें दखल देने, धमकी देने या लड़ने आने का कोई कानूनी हक नहीं है। पशुपालन देश के नागरिकों का मौलिक अधिकार है और इसे किसी की दादागिरी के कारण छीना नहीं जा सकता।
गाय को मारना और सताना घोर धर्म विरोध है
जो लोग खुद को सनातनी या धार्मिक कहते हैं, लेकिन गली-मोहल्ले की गायों को लाठी-डंडों से मारते हैं, उन्हें चोट पहुँचाते हैं या पालने वालों से विवाद करते हैं, वे असल में घोर धर्म विरोधी हैं। शास्त्रों में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि जिस गौ माता में ३३ कोटि देवी-देवताओं का वास है, उसे मारना या प्रताड़ित करना महापाप है। पशुओं के प्रति क्रूरता न सिर्फ धार्मिक और नैतिक रूप से पाप है, बल्कि भारत के कानून (भारतीय न्याय संहिता की धारा 325) के तहत एक गंभीर और संज्ञेय अपराध भी है, जिसमें दोषी को 5 साल तक की जेल का प्रावधान है।
इन पापियों को इनके किए कर्म का फल मिलेगा, भारी पाप पड़ेगा
गौ माता को मारना, उन्हें सताना और गौ-सेवा करने वालों से झगड़ा करना साक्षात ईश्वर से बैर लेने जैसा है। जो लोग अपने अहंकार में आकर इन बेजुबान पशुओं पर लाठियां उठाते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि कर्मों का हिसाब यहीं होना है। इन पापियों को इनके किए कर्म का फल निश्चित ही मिलेगा। गौ माता की हाय और उनका आंसू कभी खाली नहीं जाता। जो आज इन पर अत्याचार कर रहे हैं, उन पर ऐसा भारी पाप पड़ेगा जिसका प्रायश्चित वे सात जन्मों तक नहीं कर पाएंगे। विधाता के घर देर है, अंधेर नहीं, और हर एक अत्याचारी को अपने कुकर्मों की सजा भुगतनी ही पड़ेगी।
हिंदुओं को इस मानसिकता के खिलाफ एकजुट होना होगा
आज समय आ गया है कि समस्त हिंदू समाज को गौ-माता और गौ-पालकों के समर्थन में एक साथ आना होगा। यदि समाज का कोई व्यक्ति अपने घर में गौ-सेवा शुरू करता है और कुछ तत्व मिलकर उसे डराने या प्रताड़ित करने आते हैं, तो पूरे समाज को एकजुट होकर उस गौ-पालक के पीछे खड़ा होना चाहिए। जब तक हम अपनी संस्कृति और गौ-माता की रक्षा के लिए एक सुर में आवाज नहीं उठाएंगे, तब तक ऐसी विरोधी ताकतें हमारे ही मोहल्लों में हमारे धर्म और अधिकारों को दबाती रहेंगी। अपनी आस्था की रक्षा के लिए एकजुटता ही एकमात्र विकल्प है।
इसी मानसिकता की वजह से बढ़ रहा है नकली दूध का जहर!
आज देश में जो शुद्ध दूध की भारी कमी हो रही है और बाजार नकली, यूरिया तथा कमर्शियल केमिकल वाले सिंथेटिक दूध से पट गए हैं, उसकी सबसे बड़ी वजह यही है।
- जब लोग डर, प्रताड़ना या पड़ोसियों के रोज-रोज के विवाद के कारण अपने घरों में गाय पालना बंद कर देंगे, तो शुद्ध दूध कहाँ से आएगा?
- गौ-पालकों को हतोत्साहित करने का सीधा और भयानक नतीजा यह हो रहा है कि आज हमारी आने वाली पीढ़ी और छोटे बच्चों को असली तथा पौष्टिक दूध नसीब नहीं हो रहा है, जिससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ रहा है।
एक कड़वा सवाल: परेशानी है तो दूध पीना बंद क्यों नहीं करते?
उन सभी लोगों से एक सीधा, तीखा और कड़ा सवाल है जो गाय पालने या उन्हें सड़कों पर टहलते देखने पर लड़ने आ जाते हैं कि अगर आपको गौ माता से इतनी ही परेशानी है, तो आप गाय का दूध, दही, छाछ, मक्खन, घी और मिठाइयां खाना तुरंत बंद क्यों नहीं कर देते? दूध सबको असली चाहिए, लेकिन गाय किसी को अपने आस-पास नहीं चाहिए। यह स्वार्थ अब और नहीं चलेगा।
दूसरों के अधिकारों, अपनी आस्था और बेजुबान पशुओं की सुरक्षा का सम्मान करना सीखिए। गाय बचेगी, तभी देश को शुद्ध दूध और अच्छी सेहत मिलेगी। आइए, गौ-पालकों का विरोध करने और उनसे लड़ने के बजाय, एकजुट होकर उनका साथ दें और इस पावन कार्य में भागीदार बनें।